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A PIECE PUBLISHED 14 OCTOBER 2026

अपना तेल, अपना दीया.

The lamp and the visitor. An officer came on state business; when the business was done, he stayed and asked a personal favour. I put out the state's lamp and lit my own — because the state's oil is for the state's work.

एक अधिकारी आया। राजकाज का काम निपट गया। वह रुका और बोला, 'गुरु, एक निजी बात है। आपका आशीर्वाद चाहिए। मेरे बेटे को नौकरी चाहिए—उस विभाग में जहाँ मैं अधिकारी हूँ।'

मैंने राज्य का दीया बुझाया, अपना छोटा दीया जलाया। उसने पूछा, 'यह क्या?'
मैंने कहा, 'राज्य का तेल राज्य के काम का है। तेरी बेटे की नौकरी मेरे तेल से देखूँगा।' उसने कहा, 'लेकिन नौकरी तो राज्य की ही है।'
मैंने कहा, 'यही तो रेखा है। राज्य की नौकरी राज्य की है। पर आशीर्वाद मेरा है, और बात तेरी है। दोनों को एक तेल से नहीं जलाना।'

जो तेल राज्य का है, वह राज्य के काम का है। निजी बात को उसी दीये से जलाना—चाहे एक बार ही क्यों न हो—रेखा मिटा देता है।

तीन काम:

पहला, कल उस अधिकारी को अकेले बुलाओ और कहो, 'तेरे बेटे की बात मैं अपने समय पर देखूँगा, राज्य के समय पर नहीं।' यह एक वाक्य रेखा खींच देता है।

दूसरा, उसके विभाग के तीन महीने के प्रस्तावों की एक सूची मँगवाओ। जो एक बार रेखा पार करने को तैयार है, वह पहले भी पार कर चुका होगा।

तीसरा, अपने दीये का तेल अलग रखो। मतलब, निजी सलाह का एक समय रखो—वह राजकाज के समय से अलग हो। दोनों को एक घड़ी में नहीं बाँधना।

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