जब कीमत का युद्ध हो — When the rival bleeds first.
पहला पाठ — एक व्यापारी, एक मूल्य-युद्ध, और एक नया सूत्र।
एक व्यापारी आया। उसने कहा — पड़ोसी वही माल लागत से नीचे बेच रहा है। ग्राहक उधर जा रहे हैं। अगर मैं कीमत घटाऊँ तो घाटा, न घटाऊँ तो दुकान सूनी।
मैंने पूछा — वह कितने दिन लागत से नीचे टिक सकता है? बोला — तीन-चार महीने। मैंने पूछा — तुम्हारे पास उतने दिन का भंडार है? बोला — हाँ। फिर पूछा — जो ग्राहक उसके पास गए, वे तुम्हारे पक्के थे या सस्ते के पीछे भागने वाले? बोला — मिले-जुले।
तब मैंने नया सूत्र कहा:
**जो केवल कीमत से लड़ता है, वह अपनी ही जड़ काटता है।**
**jo keval kīmat se laṛtā hai, vah apnī hī jaṛ kāṭtā hai.**
**अर्थ — कीमत युद्ध में दोनों हारते हैं; जो पहले थकेगा वही सच्चा हारा।**
फिर तीन कदम:
पहला, तुरंत मत घटाओ कीमत। दो सप्ताह उसे अकेला छोड़ दो। उसके ग्राहकों की सूची बनाओ — कौन सिर्फ सस्ता चाहता है, कौन तुम्हारी गुणवत्ता के लिए आता था। यह देखो कि वह कितने प्रकार के माल पर घाटा बेच रहा है — सिर्फ एक वस्तु पर या सब पर?
दूसरा, अपने पक्के ग्राहकों को बुलाओ। कहो — बाज़ार में हलचल है, मैं गुणवत्ता नहीं बदलूँगा। उन्हें एक छोटी रियायत दो — थोक पर चार फीसदी या देर से भुगतान का लाभ। यह विश्वास की बात है, कीमत की नहीं।
तीसरा, जब वह तीन महीने बाद थक जाए, तब उसके पास जाओ। कहो — भाई, अब हम दोनों का नुकसान हो रहा है। एक साझा कीमत रखो, या मैं तुम्हारा बचा माल खरीद लूँ। उसे बचने का रास्ता दो। लड़ाई से बचना ही जीत है।
उसने पूछा — क्या गारंटी है कि वह मानेगा? मैंने कहा — कोई गारंटी नहीं। जो केवल कीमत से लड़ता है, वह हमेशा थकता है।
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