जब कीमत का युद्ध हो — When price is the weapon.
A merchant whose rival sells below cost. The sutra is about what a trader controls when price is not one of them.
काशी का एक कपड़ा व्यापारी आया। बोला — गुरु, मेरा प्रतिद्वंद्वी बनारसी साड़ियाँ मेरी लागत से बीस रुपये कम पर बेच रहा है। उसकी दुकान मेरी दुकान से तीन दरवाज़े छोड़कर है। मेरे पक्के ग्राहक भी उधर झाँकने लगे हैं। अगर मैं कीमत घटाऊँ तो घाटा उठाना पड़ेगा, न घटाऊँ तो दुकान सूनी।
मैंने पूछा — क्या उसकी लागत तुमसे कम है? वह बोला — नहीं, वह जानबूझकर घाटा उठा रहा है ताकि मुझे बाज़ार से हटा दे।
मैंने कहा — तो उसका हथियार कीमत है, और तुम उसी हथियार से लड़ना चाहते हो। वह गलती है।
सूत्र:
जहाँ मूल्य न तेरा हथियार, न उसका किला — वहाँ लड़ाई दूसरे मैदान में जीतो।
Jahaan moolya na tera hathiyaar, na usaka kila — vahaan ladaai doosre maidaan mein jeeto.
अर्थ: जहाँ कीमत न तुम्हारा हथियार है और न उसका किला, वहाँ लड़ाई दूसरे मैदान में जीतो।
अब तीन कदम:
पहला: अपने पुराने ग्राहकों को एक ऐसी सेवा दो जो कीमत से नहीं खरीदी जाती। हर साड़ी के साथ एक घंटे का मुफ्त फिटिंग परामर्श जोड़ दो — पल्लू का वजन, ब्लाउज़ का माप। प्रतिद्वंद्वी यह सेवा कल नहीं दे सकता, क्योंकि उसके पास न तो जगह है न अनुभव।
दूसरा: आपूर्तिकर्ता से जाकर बोलो — 'मैं तिमाही ऑर्डर दूँगा, बदले में लागत में पाँच प्रतिशत छूट चाहिए।' अपनी लागत घटाओ, कीमत नहीं। जब तुम्हारी लागत गिरेगी, तो तुम उसकी घाटा सहने की क्षमता से ऊपर रहोगे।
तीसरा: समय को अपना संधि-पत्र बनाओ। वह घाटा तीन महीने से ज्यादा नहीं झेल सकता — पूछ लो उसके माल के स्टॉक का। जब वह पिघले, तब तुम अपनी मूल कीमत पर लौट आना। उस दिन तक अपने वफादार ग्राहकों को नाम से बुलाओ, उनकी पसंद याद रखो, छोटी चीज़ें मुफ्त दो।
जो कीमत के युद्ध में उतरता है, वह दूसरे के मैदान पर लड़ता है। अपना मैदान खुद चुनो।
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